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मैं सीख रहा हूं।

*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...* मुझे हर उस बात पर प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए ॥ जो मुझे चिंतित करती है।  *मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...* जिन्होंने मुझे चोट दी है।  मुझे उन्हें चोट नहीं देनी है॥  *मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...* शायद समझदारी का सबसे बड़ा लक्षण  भिड़ जाने के बजाय अलग हट जाने में है।  *मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...* अपने साथ हुए प्रत्येक बुरे बर्ताव पर  प्रतिक्रिया करने में मेरी जो ऊर्जा खर्च होती है | वह मुझे शिथिल कर देती है। इतना ही नहीं वो मुझे  दूसरी अच्छे कार्यों में प्रवृत्त होने में भी  बाधा बनती है॥  *मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...* मैं हर आदमी से वैसा व्यवहार नहीं पा सकूँगा । जिसकी मैं अपेक्षा करता हूँ । या मैं उसके साथ जैसा व्यवहार करता हूँ।   *मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...* किसी का दिल जीतने के लिए  बहुत कठोर प्रयास करना समय और  ऊर्जा की बर्बादी है  और यह आपको कुछ नहीं देता,  केवल खालीपन से भर देता है।  *मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि......
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गलतियों से जुदा तू भी नही, मैं भी नही, दोनों इन्सान हैं, ख़ुदा तू भी नहीं, मैं भी नहीं ...! तू मुझे और मैं तुम्हें इल्ज़ाम देते हैं मगर, अपने अन्दर झांकता तू भी नहीं मैं भी नहीं....! ग़लत फ़हमियों ने कर दी पैदा दोनों में दूरियां, वरना बुरा तू भी नहीं, मैं भी नहीं....!!
*पहाड़ जितना झूठ आदमी मुँह से गटक जाता है..पर* *राई जितना सत्य उसके गले मे अटक जाता है??*
*"वक़्त" और "अध्यापक" दोनों हमें सिखाते हैं। पर दोनों में फर्क सिर्फ इतना है कि...* *"अध्यापक" सिखा कर "परीक्षा" लेते हैं और "वक़्त" परीक्षा ले कर "सिखाता" है।*
"भरोसा जितना कीमती होता है...   धोखा उतना ही महंगा हो जाता है फूल  कितना भी सुन्दर हो तारीफ  खुशबू से होती है इंसान  कितना भी बड़ा हो कद्र  उसके गुणों से होता है"..
"दर्द कितना खुशनसीब है  जिसे पा कर लोग  अपनों को याद करते हैं,  दौलत कितनी बदनसीब है  जिसे पा कर लोग अक्सर अपनों को भूल जाते हैं..."
“समय जिसका साथ देता है वो बड़ों बड़ों को मात देता है।" अमीर के घर पे बैठा 'कौवा' भी सबको 'मोर' लगता है .. और..  गरीब का भूखा बच्चा भी सबको 'चोर' लगता है.. इंसान की  अच्छाई  पर,        सब खामोश  रहते हैं... चर्चा अगर उसकी बुराई पर हो,     तो गूँगे भी बोल पड़ते हैं..!!!